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सरस्वती संस्कृत पाठशाला ब्रिटिशकालीन रोही, स्थापित 1930 वेबसाइट में आपका स्वागत है

विद्यां ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम् । पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥ हिन्दी भावार्थ:

विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

किन्तु कौटिल्य ने बताया है की विद्या से विनय के अतिरिक्त और भी गुण आते हैं जो इस प्रकार हैं |
  • 1. शील
  • 2. परहिताशक्ति
  • 3. अनुत्सेक
  • 4. क्षमा
  • 5. धैर्य
जहाँ ये पाँचों लक्षण दिखाई पड़े तो समझना चाहिए की इस व्यक्ति में विद्या का परिपाक हो चूका है | इससे यह भी ज्ञात होता है की विद्या या शिक्षा केवल ज्ञान की वृद्धि के लिए नहीं होती अपितु उससे सदाचार का भी उदय होता है | सदाचार सर्वकालिक है, अतः आधुनिक परिवेश में भी इसका उतना ही महत्व है जितना पहले था | आधुनिक परिवेश में शिक्षा के पूर्वोक्त सभी आयाम यद्यपि व्यव्हार में नहीं हैं किन्तु वे आज भी अनुकरणीय हैं |


- रमेश त्रिपाठी बेश (प्रधानाचार्य )

सरस्वती संस्कृत पाठशाला ब्रिटिशकालीन (रोही, स्थापित 1930)

सरस्वती संस्कृत पाठशाला ब्रिटिशकालीन रोही, स्थापित 1930

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